Please enable JavaScript.
Coggle requires JavaScript to display documents.
निर्श्रमता ही विश्राम - Coggle Diagram
निर्श्रमता ही विश्राम
मध्यस्थ दर्शन: मानव व्यवहार दर्शन (अध्याय 5)
I. केंद्रीय विचार: निर्भ्रमता ही विश्राम (The Central Idea: Nirbhramata is Rest)
अशेष मानव विश्राम की आशा एवं प्रतीक्षा में है [1].
सफलता केवल निर्भ्रम अथवा निर्भ्रान्त अवस्था में ही है [2].
समाधान की ओर विश्राम, तथा समस्या की ओर श्रम का अनुभव है [1, 3].
निर्भ्रमता के लिए विवेक एवं विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है [4].
II. अस्तित्वगत गतियाँ और मानवीय अवस्थाएँ (Existential Movements) [5]
विकास व हास भेद से $\rightarrow$ अवस्था [5].
अवस्था भेद से $\rightarrow$ आशा [5].
आकर्षण-प्रत्याकर्षण भेद से $\rightarrow$ आसक्ति [5].
आसक्ति भेद से $\rightarrow$ विवशता [5].
विवशता भेद से $\rightarrow$ संवेग [5].
संवेग भेद से $\rightarrow$ कर्म [5].
कर्म भेद से $\rightarrow$ फल [5].
फल भेद से $\rightarrow$ समस्या एवं समाधान [5].
समस्या एवं समाधान भेद से $\rightarrow$ हास-विकास-जागृति सहज गतियाँ हैं [5].
इन गतियों से प्रादुर्भाव: मानवीयता, अमानवीयता एवं अतिमानवीयता [5].
III. मानव जागृति का उद्देश्य एवं दर्शन (Goal of Awakening & Darshan)
मानव की जागृति केवल: बौद्धिक समाधान एवं भौतिक समृद्धि के लिए है [5].
बौद्धिक समाधान की पुष्टि: अनुभूति ही समाधान है [1].
दर्शन के भेद (पुष्टि के लिए) [6]:
स्थूल समझ: शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध की जानकारी (मन) [6].
सूक्ष्म समझ: वृत्ति, चित्त एवं सापेक्ष शक्तियों की जानकारी [6].
कारणात्मक समझ: निरपेक्ष शक्ति (सत्ता), आत्मा और बुद्धि की समझ [6].
IV. क्रियाएँ और अभिव्यक्ति (Actions and Manifestation)
संपूर्ण इकाइयाँ: सत्ता में संपृक्त क्रिया के रूप में अभिव्यक्त हैं [6].
समस्त क्रियाएँ: रूप और शब्द के भेद से हैं [6].
मानव में परिलक्षित क्रियाएँ: स्फुरण, प्रेरणा, क्रांति, संवेग, आवेग तथा प्रयोग [6].
V. विशिष्ट क्रियाओं के तात्पर्य और परिभाषाएँ (Meanings and Definitions)
रूप क्रिया का तात्पर्य: हर इकाई में निहित गुण, स्वभाव, धर्म से [6].
शब्द क्रिया का तात्पर्य: रूप क्रिया और अर्थ को निर्देशित करना (संप्रेषणा) [7].
शब्द: क्रिया को निर्देशित करने के लिए प्रयुक्त अक्षर समूह (केवल नाम) [8].
परिभाषा: शब्द के अर्थ को व्यक्त करने हेतु प्रयुक्त शब्द समूह (क्रिया की मौलिकता स्पष्ट करती है) [8].
भाव: परिभाषा सहज मौलिकता [8].
स्फुरण: जागृति की ओर प्राप्त प्रेरणा [7].
प्रेरणा (अनुकूल चेष्टा): उभय सुकृति (जागृति) की ओर गति [7, 9].
उभय सुकृति: गुरुमूल्यन, दीर्घ-परिणाम/अपरिणामता, और जागृति की ओर गति [7].
प्रतिक्रांति (प्रतिकूल चेष्टा): उभय विकृति (हास) की ओर गति [7, 9].
उभय विकृति: अवमूल्यन, शीघ्र परिणाम, और हास की ओर गति [7].
संवेग: संयोग से प्राप्त वेग [8].
आवेग: आवश्यकतानुसार प्राप्त वेग [8].
प्रयोग: प्रयासपूर्वक प्राप्त वेग [8].
VI. मौलिकता का निर्धारण (Determining Inherent Nature - Maulikta)
निर्णय का आधार: रूप, गुण, स्वभाव तथा धर्म के निरीक्षण, परीक्षण व अध्ययन से [10].
रूप (Form): आकार, आयतन एवं घनता से निर्णय [10].
गुण (Quality): सम, विषम और मध्यस्थ के भेद से निर्णय [10].
प्रयुक्ति: उद्भव, विभव या प्रलय में [10].
स्वभाव (Nature): इकाई द्वारा गुण की उपयोगिता से निर्णय [10].
प्रवृत्ति: उद्भववादी, विभववादी या प्रलयवादी [9, 10].
धर्म (Dharma): जो जिसकी धारणा है [9].
पदार्थावस्था का धर्म: अस्तित्व [9].
प्राणावस्था का धर्म: अस्तित्व सहित पुष्टि [9].
जीवावस्था का धर्म: अस्तित्व, पुष्टि सहित जीने की आशा [9].
ज्ञानावस्था का धर्म: अस्तित्व, पुष्टि, जीने की आशा सहित सुख [9].
VII. परिवर्तन की चेष्टा और सापेक्षता (Striving and Relativity)
स्फुरण / क्रांति (अनुकूल चेष्टा): समाधान प्राप्त होता है [9].
स्व-सापेक्षता: आत्मा की प्रेरणा से संपन्न संकल्प, इच्छा, विचार और आशा [3]. (इससे विश्राम प्राप्त होता है [3]).
प्रतिक्रांति (प्रतिकूल चेष्टा): समस्या उत्पन्न होती है [9].
पर-सापेक्षता: चैतन्य पक्ष की एकसूत्रता के अभाव से उत्पन्न इच्छा, आशा, विचार [3]. (इससे श्रम उत्पन्न होता है [3]).
मानव धर्म: मानव सुख धर्मी है (समाधान = सुख, समस्या = दुःख) [3].
श्रम की परिभाषा: मानव इकाई की आशा और उपलब्धि के बीच में ऋणात्मक स्थितियाँ [3].