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(1.2 भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का संदर्भ और विकास) - Coggle…
1.2 भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का संदर्भ और विकास
✅ 1.3 भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की सीमाएँ
✅ 1.4 लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS)
🔴 1. राशन कार्ड का डिजिटलीकरण:
उद्देश्य: लाभार्थियों की जानकारी का ऑनलाइन सत्यापन व संग्रहण।
विशेषताएँ:
लाभार्थियों की मासिक पात्रता,
निर्भर सदस्यों की संख्या,
FPS से अनाज उठाव की ऑनलाइन निगरानी।
राज्य: आंध्र प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश आदि में बड़े पैमाने पर लागू।
🔴 2. आधार से लिंकिंग:
अब तक 56% राशन कार्ड आधार संख्या से जोड़े जा चुके हैं।
लाभ:
प्रामाणिकता बढ़ी,
लक्ष्यीकरण में सुधार,
घोस्ट कार्ड/बेनामी लाभार्थियों की पहचान में सहायता।
🔴 3. फेयर प्राइस शॉप (FPS) आवंटन की कंप्यूटरीकरण:
उद्देश्य: स्टॉक की स्थिति की रिपोर्टिंग व ट्रक चालान ऑनलाइन जारी करना।
लाभ:
लेन-देन की पारदर्शिता व निगरानी में सुधार।
कई राज्यों ने e-PoS (Electronic Point of Sale) मशीनें भी स्थापित कीं,
जिससे वास्तविक लाभार्थी को वास्तविक समय में अनाज वितरण सुनिश्चित हुआ।
🔴 4. जीपीएस ट्रैकिंग का उपयोग:
राज्य: छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु
उद्देश्य:
राज्य डिपो से FPS तक खाद्यान्न ले जा रहे ट्रकों की जीपीएस से निगरानी।
रिसाव व गबन पर रोक।
🔴 5. DBT (Direct Benefit Transfer) पायलट परियोजना:
केंद्र शासित प्रदेशों — चंडीगढ़, पुडुचेरी, दादरा एवं नगर हवेली में पायलट आधार पर लागू।
🔴 1.6 भारत की PDS प्रणाली में सुधार की आवश्यकता
✅ C. उपभोक्ता (Consumer) पक्ष सुधार
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✅ B. आपूर्ति (Supply) पक्ष सुधार:
पूर्ण कंप्यूटरीकरण:
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मासिक बिक्री घोषणाएँ:
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SMS अलर्ट:
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GPS ट्रैकिंग:
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FPS संचालन का विकेंद्रीकरण:
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✅ A. खरीद (Procurement) पक्ष सुधार:
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🟢 एक देश, एक राशन कार्ड (ONORC)
✅ मुख्य विशेषताएँ:
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🟣 1.7 TPDS के विकल्प)
1.8 यूनिवर्सल बनाम टारगेटेड PDS
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शुरुआत:
वर्ष 1997 में TPDS लागू किया गया, जिससे गरीबों पर विशेष ध्यान दिया जा सके।
गरीबी रेखा से नीचे (BPL) परिवारों को प्रत्येक माह 35 किग्रा अनाज अत्यधिक सब्सिडी पर दिया जाता है।
APL (Above Poverty Line) को उच्च दरों पर राशन मिलता है।
TPDS ने PDS के सार्वभौमिक स्वरूप को बनाए रखते हुए BPL पर केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया।
🔷 1.4.1 TPDS की प्रमुख विशेषताएँ:
🔸 1. लक्ष्यीकरण (Targeting):
जिनकी वार्षिक आय ₹15,000 से कम हो, उन्हें BPL में रखा गया।
शुरुआत में प्रति परिवार 10 किग्रा/माह, 2002 से बढ़ाकर 35 किग्रा/माह किया गया।
🔸 2. दोहरी मूल्य प्रणाली (Dual Pricing):
2000:
BPL को: FCI की लागत का 50% मूल्य।
APL को: 100% लागत पर राशन।
2001:
AAY (Antyodaya Anna Yojana) को:
गेहूं ₹2/किग्रा
चावल ₹3/किग्रा
🔸 3. केंद्र-राज्य की संयुक्त भूमिका:
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🔷 FCI की भूमिका (Food Corporation of India):
MSP पर खरीद (Procurement from Farmers)
संचालन एवं बफर स्टॉक बनाए रखना
राज्यों को अनाज आवंटित करना
राज्य डिपो तक परिवहन
केंद्रीय मूल्य पर राज्यों को विक्रय
✅ 1.4.2 TPDS से जुड़ी समस्याएँ
🔴 1. लक्ष्यीकरण में खामियाँ:
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🔴 1. गरीबों को सीमित लाभ:
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गरीबों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
वास्तविकता में गरीब वर्ग की खुले बाजार पर निर्भरता ज्यादा रही है।
PDS का कवरेज, गुणवत्ता और उपलब्धता गरीबों की जरूरतों के अनुरूप नहीं रही।
🔴 2. शहरी पक्षपात (Urban Bias):
PDS लंबे समय तक मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रहा।
ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तार हुआ, लेकिन अब भी वहां समय पर वितरण और पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता एक समस्या है।
🔴 3. खाद्य सब्सिडी का भारी बोझ:
NFSA-2013 लागू होने के बाद सरकार का सब्सिडी खर्च अत्यधिक बढ़ गया।
APL वर्ग (Above Poverty Line) को PDS से खरीदने में कम रुचि → FCI में स्टॉक का जमाव।
समर्थक किसान लॉबी के कारण MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) बढ़ता है, जबकि
जन वितरण मूल्य (Issue Price) घटता है → यह अंतर वित्तीय असंतुलन पैदा करता है।
🔴 4. खाद्यान्न का नुकसान:
2011–2017 के बीच 61,824 टन खाद्यान्न नष्ट हुआ।
कारण:
कीट आक्रमण,
गोदामों की खराब स्थिति,
बारिश, बाढ़ में क्षति,
गुणवत्ता नियंत्रण की कमी,
संबंधित कर्मचारियों की लापरवाही।
🔴 5. FCI की कार्यप्रणाली में अक्षमता:
अत्यधिक केंद्रीकृत और नौकरशाही व्यवस्था के कारण संचालन में अक्षमता देखी गई।
क्रय लागत, वितरण लागत, भंडारण लागत लगातार बढ़ रही है।
संचालन में जवाबदेही और पारदर्शिता की कमी।
🔴 6. बाजार मूल्य में वृद्धि:
सरकार की भारी मात्रा में खरीद से खुले बाजार में अनाज की उपलब्धता घटती है।
इससे बाजार में मूल्य बढ़ता है, जिससे PDS से बाहर गरीब वर्ग प्रभावित होता है।
इस "दोहरे बाजार तंत्र" (PDS बनाम Open Market) से खाद्य सुरक्षा से वंचित लोग नुकसान में रहते हैं।
🔴 7. वितरण प्रणाली की चुनौतियाँ:
राशन कार्ड वितरण में अनियमितताएँ।
मात्रा और गुणवत्ता में भिन्नता (पहले 35kg/परिवार → अब PHH को 5kg/व्यक्ति)।
वजन में गड़बड़ी, देर से आपूर्ति, और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं बनी हुई हैं।
कई बार लाभार्थियों को पूरा राशन नहीं मिलता या बेकार गुणवत्ता का अनाज मिलता है।
🔷 1970 का दशक:
PDS को सार्वभौमिक प्रणाली (Universal System) के रूप में लागू किया गया – सबके लिए सब्सिडी वाला वितरण।
🔷 1992: RPDS (पुनर्गठित PDS)
1775 विकास खंडों में लागू।
उद्देश्य: दूर-दराज़, जनजातीय, सूखा/मरु क्षेत्र व दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच।
कार्यक्रम: DPAP, ITDP, DDP, DHA क्षेत्रों में लागू।
🔷 1997: TPDS (लक्षित PDS)
6 करोड़ गरीब परिवारों के लिए शुरू।
गेहूं/चावल की वार्षिक 7.2 मिलियन टन खाद्यान्न आवंटित।
केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर:
गरीबों की पहचान,
खाद्यान्न खरीद,
वितरण करती हैं।
APL के लिए भी "अतिरिक्त आवंटन" (higher rate पर) जारी किया गया।
🔷 2000: अंत्योदय अन्न योजना (AAY)
सबसे गरीब परिवारों के लिए शुरू।
शुरुआत में 25 किग्रा/परिवार/माह, फिर 2002 में 35 किग्रा।
दरें: गेहूं ₹2/किग्रा, चावल ₹3/किग्रा।
2003-06: 3 चरणों में विस्तार – अब 2.5 करोड़ गरीब परिवार शामिल।
लाभार्थी: विधवा, वृद्ध, विकलांग, भूमिहीन, आदिवासी आदि।
🔷 2013: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA)
82 करोड़ जनसंख्या को लाभ।
व्यक्तिगत पात्रता: 5 किग्रा/व्यक्ति/माह खाद्यान्न।
🔷 प्रारंभिक दौर:
PDS की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के समय राशनिंग उपाय के रूप में हुई।
1960 से पहले PDS आयातित अनाज पर निर्भर थी।
खाद्यान्न संकट के बाद, सरकार ने:
कृषि मूल्य आयोग (अब CACP) और
भारतीय खाद्य निगम (FCI) की स्थापना की।